पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का निर्णय लिया है। स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित एक भव्य समारोह के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर ने इस मंच का हिस्सा बनने की घोषणा की। गौरतलब है कि ट्रंप ने गज़ा संकट के समाधान और विश्व शांति के लिए भारत और पाकिस्तान सहित कई देशों को इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता दिया था।
अमेरिका की ओर पाकिस्तान का बढ़ता झुकाव
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान के अनुसार, उन्हें उम्मीद है कि इस बोर्ड के माध्यम से गज़ा में स्थायी युद्धविराम, फलस्तीनियों के लिए मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान का यह कदम उसकी हालिया ‘अमेरिका परस्त’ नीति का हिस्सा है। इससे पहले भी पाकिस्तान ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार देने की सिफारिश की थी और इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स (ISF) में शामिल होने की पेशकश भी की थी।
भारत का रुख अब तक स्पष्ट नहीं
जहाँ पाकिस्तान ने ट्रंप के न्योते को तुरंत स्वीकार कर लिया है, वहीं भारत सरकार ने इस पर अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय इस प्रस्ताव की बारीकियों और इसके कूटनीतिक निहितार्थों का अध्ययन कर रहा है। ट्रंप के इस ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में भारत की भागीदारी वैश्विक शांति के समीकरणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, लेकिन फिलहाल भारत ‘वेट एंड वॉच’ (इंतजार और नजर) की स्थिति में है।
पाकिस्तान में आंतरिक विरोध और कूटनीतिक बहस
इस फैसले के बाद पाकिस्तान के भीतर शहबाज सरकार की तीखी आलोचना भी शुरू हो गई है। आलोचकों का कहना है कि पाकिस्तान अपनी पारंपरिक विदेश नीति से भटक रहा है। पारंपरिक रूप से पाकिस्तान गज़ा-इजरायल विवाद में कड़ा रुख अपनाता रहा है, लेकिन अमेरिका के नेतृत्व वाले शांति बोर्ड में शामिल होना कई लोगों को इजरायल के प्रति नरम रुख के संकेत के रूप में दिख रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की चरमराई अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से मदद की जरूरत ने उसे अमेरिका की ओर झुकने पर मजबूर किया है।