एम्स भोपाल ने कीलोइड घावों के लिए विकसित किया नया वैज्ञानिक पैमाना: इलाज में आएगी क्रांति

भोपाल। कटने, जलने, या कान छिदवाने के बाद बनने वाले कठोर और दर्दनाक घावों, जिन्हें कीलोइड (Keloid) कहा जाता है, के सटीक आकलन के लिए एक बड़ी वैज्ञानिक सफलता हासिल हुई है। एम्स भोपाल (AIIMS Bhopal) के डॉक्टरों ने विशेष रूप से छाती के ऊपरी हिस्से (प्री-स्टर्नल) पर बनने वाले कीलोइड के दर्द, संक्रमण और जीवन पर उनके असर को मापने के लिए एक नया और विशिष्ट पैमाना तैयार किया है।

इस नए स्केल का नाम एम्स भोपाल प्री-स्टर्नल कीलोइड स्केल (ABPSKS) रखा गया है। यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया में अब तक इस्तेमाल हो रहे वैनकूवर स्कार स्केल (VSS) और पेशेंट एंड ऑब्जर्वर स्कार असेसमेंट स्केल (POSAS) जैसे पैमानों में इन जटिल कीलोइड्स की संवेदनशीलता, दर्द और मानसिक असर को सही से मापने की क्षमता नहीं थी।

क्यों है यह स्केल खास?

ABPSKS स्केल दो हिस्सों में बंटा है:

मरीज का अनुभव (Patient Score): यह खुजली, दर्द, संक्रमण और नींद पर असर जैसे लक्षणों को 0 से 3 अंक तक मापता है।

डॉक्टर का मूल्यांकन (Observer Score): यह कीलोइड की मोटाई, फैलाव, रंग और स्राव को 0 से 4 अंक तक मापता है।

शारीरिक और मानसिक पहलू: पहली बार, यह स्केल शारीरिक लक्षणों के साथ-साथ कीलोइड के कारण मरीज के मानसिक तनाव (Quality of Life) और जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को भी वैज्ञानिक रूप से मापता है।

सटीक उपचार: यह डॉक्टरों को उपचार (सर्जरी, लेजर, इंजेक्शन) से पहले और बाद के परिणामों की तुलना करने में मदद करेगा, जिससे इलाज की प्रभावशीलता का सटीक आकलन हो सकेगा।

शोध का प्रकाशन

यह महत्वपूर्ण शोध एम्स भोपाल के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. मनाल खान और उनकी टीम द्वारा किया गया है। इस रिसर्च को हाल ही में प्रतिष्ठित Cureus Journal में प्रकाशित किया गया है। डॉक्टरों का मानना है कि यह स्केल कीलोइड के उपचार और प्रबंधन में एक मील का पत्थर साबित होगा।