भारतीय सेना की दक्षिणी कमान ने मंगलवार को राजस्थान के जैसलमेर के विशाल मरुस्थलीय क्षेत्रों में चल रहे बड़े त्रि-सेवा अभ्यास ‘त्रिशूल’ के तहत एक महत्वपूर्ण सामरिक ड्रिल ‘अभ्यास मारू ज्वाला’ का सफल आयोजन किया। इस अभ्यास का प्राथमिक उद्देश्य रेगिस्तानी और अर्ध-रेगिस्तानी भूभागों में भारतीय सशस्त्र बलों की उच्च परिचालन तत्परता और तीनों सेनाओं के बीच एकीकृत युद्ध क्षमताओं का गहन परीक्षण करना था।
आधुनिक युद्ध सिद्धांतों का परीक्षण
‘अभ्यास मारू ज्वाला’ को दक्षिणी कमान द्वारा विशेष रूप से डिजाइन किया गया था ताकि युद्ध की वास्तविक परिस्थितियों में सैनिकों, अत्याधुनिक बख़्तरबंद वाहनों और हवाई समर्थन के बीच बेजोड़ तालमेल स्थापित किया जा सके। इस अभ्यास ने आधुनिक युद्ध सिद्धांतों के अनुरूप, दुश्मन की रेखाओं के भीतर गहरे तक घुसपैठ करने की सेना की क्षमता पर विशेष जोर दिया।
अभ्यास में सेना की विभिन्न इकाइयों ने भाग लिया, जिसमें मुख्य रूप से बख्तरबंद ब्रिगेड, मैकेनाइज्ड इन्फेंट्री इकाइयाँ और लंबी दूरी के तोपखाने शामिल थे। सैनिकों ने शत्रु के ठिकानों और मजबूत गढ़ों को सटीकता से निशाना बनाने और तेजी से नष्ट करने के लिए आधुनिक निगरानी प्रणालियों और क्विक रिएक्शन टीमों (QRTs) का प्रभावी ढंग से उपयोग किया।
वरिष्ठ नेतृत्व की निगरानी
उच्च स्तरीय सैन्य अधिकारियों ने इस ऑपरेशनल ड्रिल का अवलोकन किया। अभ्यास के सफल समापन पर, दक्षिणी कमान के प्रमुख ने सैनिकों के उच्च मनोबल, व्यावसायिकता और जटिल सामरिक चुनौतियों से निपटने की उनकी क्षमता की सराहना की।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ‘अभ्यास मारू ज्वाला’ जैसे गहन सैन्य अभ्यास, क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए भारत की सैन्य शक्ति की दृढ़ता को प्रदर्शित करते हैं। साथ ही, यह अभ्यास भविष्य के एकीकृत युद्ध परिदृश्यों के लिए भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना के बीच सहयोग और समन्वय को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।