राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पूरा होने के उपलक्ष में संघ द्वारा देश भर में कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। सर संघ चालक डॉ. मोहन भागवतn 2 दिन के भोपाल प्रवास पर हैं। आज शनिवार क दूसरे दिन वह शक्ति सम्मेलन और विभिन्न समाजों के प्रतिनिधियों से चर्चा कर उन्हें संघ के बारे में अवगत करवा रहे हैं। इसके पहले श्री भागवत ने शुक्रवार को रविंद्र भवन में शहर के चुनिंदा बुद्धिजीवियों से चर्चा की। इसमें शिक्षा, चिकित्सा , व्यापार, मीडिया सहित अन्य क्षेत्रों से प्रतिनिधियों को आमंत्रित गया था।
डा. भागवत ने संघ के विचार, कार्यपद्धति और लक्ष्यों पर चर्चा करते हुए कहा कि हिंदू कोई जाति नहीं, बल्कि यह विभिन्न समाजों की एक जैसी मनोवृत्ति और स्वभाव है। ‘हिंदू’ नाम इसलिए दिया गया, क्योंकि हम सभी पंथों को मानते हैं और उनका सम्मान करते हैं। हिंदू, हिंदवी और भारत, ये तीनों एक ही हैं। ‘हिंदू’ कहने से हम सब एक सूत्र में बंधते हैं। डॉ भागवत ने कहा कि देश में चार तरह के हिंदू हैं। एक कहता है गर्व से कहो हम हिंदू हैं। दूसरा कहता है गर्व से क्या कहना हम तो हिंदू हैं ही। तीसरा कहता हैं बोलना क्या है वह तो है और चौथे वह हैं जो भूल चुके हैं कि वह है हिंदू ही हैं। इस तरह जो भूल चुके हैं , उन्हें जोड़ना है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत एक स्वभाव है। भूगोल बदले जा सकते हैं 1947 के पहले भारत कराची तक था। भूगोल बदल गया, लेकिन उनका स्वभाव नहीं बदला । भागवत ने कहा कि हिंदू सभी भारतीयों का विचार है, हिंदू भारत का स्वभाव बताता है।
उन्होंने कहा कि इन 100 वर्षों में संघ ने बहुत कुछ किया है और संघ के बारे में कई गलतफहमियां भी हैं । उन्होंने कहा कि यदि संघ को जानना है तो इससे जुड़ना बहुत जरूरी है। जब तक आप जुड़ेंगे नहीं, इसके मूल में नहीं पहुंचेंगे। तब तक आप संघ को नहीं समझ पाएंगे। आप बीजेपी, विश्व हिंदू परिषद और अन्य संगठन को देखकर संघ के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि जिन्हें संघ को समझना है, वह संघ से जुड़ें और जाने। यदि अच्छा लगे तो जुड़े रहें, अन्यथा छोड़ भी सकते हैं। कोई जरूरी नहीं है जो केवल एक बार आ गया तो हमेशा रहेगा ही । जब चाहे आ सकता है, जब चाहे जा सकता है। उन्होंने कहा कि संघ सबको जोड़ना सिखाता है। ऐसे संतुलन और अनुशासन को ही धर्म कहते हैं। सभी विकसित देश समाज की एकता और गुणवत्ता की वजह से ही विकसित हुए हैं। संघ के विचार भारत की सनातन परंपरा से ही लिए गए हैं।