राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में, संघ प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को कई महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिकता और तकनीक का विरोध किए बिना हमें अपनी संस्कृति, भाषा और परंपराओं को घरों में जीवित रखना चाहिए। भागवत ने कहा कि शिक्षा केवल जानकारी हासिल करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को सुसंस्कृत और बेहतर नागरिक बनाती है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) को सही दिशा में एक कदम बताया, जिसमें पंचकोषीय शिक्षा जैसे प्रावधान शामिल हैं।
सामाजिक एकता और सौहार्द पर जोर
आरएसएस द्वारा ‘नए क्षितिज’ कार्यक्रम के तहत आयोजित एक समारोह में, भागवत ने समाज को एकजुट करने के तरीकों पर बात की। उन्होंने कहा कि एक-दूसरे के तीज-त्योहारों में शामिल होने से सामाजिक दूरियां कम होती हैं और आपसी प्रेम और करुणा बढ़ती है। उन्होंने लोगों से अपील की कि किसी भी विवाद या भड़काऊ स्थिति में कानून को हाथ में न लें, बल्कि देश की कानूनी व्यवस्था पर भरोसा रखें। भागवत के अनुसार, भारत की विविधता में ही उसकी शक्ति निहित है, और विभिन्न जाति, पंथ और समुदायों के बीच सौहार्द बनाए रखना बेहद जरूरी है।
सरकार से संबंध और निर्णय लेने की प्रक्रिया
जब आरएसएस और सरकार के बीच संबंधों पर सवाल पूछा गया, तो भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ का सरकार के साथ अच्छा समन्वय है। हालांकि, उन्होंने कहा कि यह धारणा गलत है कि आरएसएस भाजपा के लिए फैसले लेता है। उन्होंने कहा, “हम केवल सलाह दे सकते हैं, निर्णय नहीं ले सकते। अगर हम निर्णय ले रहे होते, तो क्या इसमें इतना समय लगता?” उन्होंने आगे कहा कि संघ में मतभेद हो सकता है, लेकिन मनभेद नहीं। भागवत ने यह भी कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री जेपी नारायण से लेकर प्रणब मुखर्जी तक, कई नेताओं का संघ के प्रति नजरिया बदला है, इसलिए हमें कभी भी किसी के नजरिए में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं करना चाहिए।
व्यवस्था में सुधार की जरूरत
भागवत ने मौजूदा कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी अपनी राय दी। उन्होंने कहा कि भारत में आज भी वही व्यवस्थाएं कायम हैं, जिनका निर्माण अंग्रेजों ने अपने शासन के लिए किया था। उन्होंने कहा कि इस पुरानी व्यवस्था में कुछ आंतरिक विरोधाभास हैं, और हमें कुछ नवाचार (innovation) करने होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भले ही सरकार में बैठा व्यक्ति पूरी तरह से संघ के प्रति समर्पित हो, उसे सिस्टम की बाधाओं के भीतर ही काम करना पड़ता है, और हमें उसे यह स्वतंत्रता देनी होगी।