भोपाल: राजधानी की हवा में धूल और माइक्रोप्लास्टिक का अदृश्य खतरा बढ़ता जा रहा है। यहां की हवा में पीएम 2.5 और पीएम 10 कण लगातार बढ़ रहे हैं। यहां की हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक कण भी सांस के जरिए शरीर में जा रहे हैं। इससे फेफड़े का कैंसर तेजी से बढ़ रहा है। यही हाल रहा तो 20 साल में भोपाल फेफड़ों की बीमारियों का गढ़ बन सकता है। यहां गैस त्रासदी और बढ़ते प्रदूषण ने शहर में सांस रोगियों की संख्या बढ़ी है। दिसंबर 1984 की भोपाल गैस त्रासदी की वजह से राजधानी में अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज, ब्रोंकाइटिस और फेफड़े के कैंसर के मरीज बढ़े हैं। गैस पीड़ितों के बच्चे और पोते-पोति भी सांस से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार भोपाल में फेफड़े की बीमारियां बढ़न के लिए बड़ा कारण वायु प्रदूषण है। ऐसे लोग फेफड़े के रोगी हो रहे हैं जो धूम्रपान नहीं करते हैं। मरीजों के हिसाब से यहां लंग्स के पर्याप्त क्लीनिक नहीं हैं। राजधानी में फेफड़े की बीमारियों पर केन्द्रित अलग लंग्स रिसर्च इंस्टिट्यूट की जरूरत है। शहर में अभी गैस राहत अस्पताल, हमीदिया और एस भोपाल में लंग्स की बीमारियों के लिए विशेष विभाग हैं, लेकिन पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट और हाई-रेजोल्यूशन सीटी स्कैन जैसी जांच सीमित संख्या में उपलब्ध हैं। सर्दियों में एयर क्वालिटी इंडेक्स 200 से ऊपर चला जाता है। ठंड से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और धूल जैसे कण हवा में अधिक समय तक बने रहते हैं। इससे अस्थमा और ब्रोंकाइटिस के मरीजों की संख्या बढ़ रही है।