Suma Uikey Sucess Story: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ के 123वें एपिसोड में मध्य प्रदेश की एक साधारण महिला, सुमा उईके की प्रेरणादायक कहानी साझा की। केवल 10वीं तक पढ़ी-लिखी, आदिवासी पृष्ठभूमि से आने वाली सुमा आज न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि दूसरों को भी रोजगार दे रही हैं।
स्व-सहायता समूह से आत्मनिर्भरता की शुरुआत
सुमा उईके बालाघाट जिले के कटंगी ब्लॉक के गांव भजियापार की निवासी हैं। पहले वे पारंपरिक जीवनशैली और घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित थीं। लेकिन 2014 में उन्होंने आजीविका मिशन के तहत एक स्व-सहायता समूह से जुड़कर अपने जीवन की दिशा बदली। उन्हें समूह का अध्यक्ष भी बनाया गया। 2017 में आजीविका मिशन से जुड़ने के बाद उन्हें कृषि, पशुपालन और व्यवसायिक प्रशिक्षण मिले, जिससे उन्हें आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा मिली।
मशरूम की खेती से मिली नई पहचान
सुमा दीदी ने RSETI से ऑर्गेनिक मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण लिया और 2021 में अपने घर पर आयस्टर मशरूम की खेती शुरू की। प्रारंभ में उन्होंने रिवॉल्विंग फंड के माध्यम से ₹2000 का लोन लिया। एक साल तक लगातार खेती कर उन्होंने अपने गांव में इसे एक जीविका का साधन बनाया। हालांकि, कोविड लॉकडाउन के दौरान बिक्री में गिरावट के कारण उन्हें यह काम कुछ समय के लिए अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा।
‘दीदी कैंटीन’ और दूसरी शुरुआत
2022 में जनपद पंचायत, कटंगी परिसर में सुमा को ‘दीदी कैंटीन’ संचालन का मौका मिला। इस पहल ने उन्हें फिर से खड़ा होने का अवसर दिया और उन्होंने इसे पूरी लगन से सफल बनाया। इस दौरान उन्होंने थर्मल थेरेपी की भी ट्रेनिंग ली, जिससे उनके काम का दायरा और बढ़ा।
प्रधानमंत्री मुद्रा लोन से आगे बढ़ा कदम
आजीविका मिशन के जरिए ही सुमा को प्रधानमंत्री मुद्रा योजना की जानकारी मिली। उन्होंने लोन लेकर ‘आजीविका थर्मल थेरेपी सेंटर’ की स्थापना की। यह न सिर्फ उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में सहायक रहा, बल्कि उन्होंने अन्य महिलाओं को भी इसमें काम देकर रोजगार उपलब्ध कराया।
एक प्रेरणादायक सफर की मान्यता
सुमा उईके की कहानी मेहनत, प्रशिक्षण और आत्मविश्वास का प्रतीक बन चुकी है। आज वे मशरूम उत्पादन, पशुपालन, दीदी कैंटीन और थेरेपी सेंटर जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हैं। उनके इस संघर्ष और आत्मनिर्भरता के सफर को प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मन की बात’ में साझा कर पूरे देश के लिए प्रेरणा बना दिया। इस प्रकार बालाघाट की सुमा उईके ने यह साबित किया कि सीमित शिक्षा और साधनों के बावजूद यदि संकल्प मजबूत हो, तो सफलता निश्चित है।