bhopal gas tragedy: भोपाल के इतिहास का सबसे दर्दनाक हादसा- भोपाल गैस त्रासदी के कचरे को जला दिया गया है। इस कचरे को जलने और डिस्पोज करने के लिए कोर्ट के ऑर्डर के बाद पीथमपुर लाया गया। ये पूरा कचरा दिसंबर तक सही ढंग से डिस्पोज हो जाएगा। पूरा काम कोर्ट द्वारा निर्धारित एक्सपर्ट कमेटी की देख रेख में हुआ जहां सभी चीजों का पूरा ध्यान रखा गया।
यूनियन कार्बाइड के पूरे कचरे को पीथमपुर के भस्मक संयंत्र में जलकर कर राख कर दिया गया है। अब इसे यहीं ट्रीट करके, स्टोर करके फिर दिसंबर तक डिस्पोज किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में सभी तरह के सुरक्षा उपकरणों का ध्यान रखा गया और कोर्ट द्वारा निर्धारित एक्सपर्ट कमेटी में मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (नीरी) के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
55 दिन में 14 बार की डाइऑक्सिन फ्यूरान की जांच
पीथमपुर के भस्मक संयंत्र का संचालन करने वाली एनर्जी एन्वायरो कंपनी ने यूनियन कार्बाइड का कचरा जलाने के दौरान 55 दिन में 14 बार, हर हफ्ते में 2 बार। डायक्सीन फ्यूरान गैस का सैंपल किया और इसे जांच के लिए गुरुग्राम की फेयर लैब में अलग-अलग समय के बीच भेजा गया।
5 मई से शुरू हुई थी कचरा जलने की प्रक्रिया
धार जिले के पीथमपुर में कचरा जलाने का काम 5 मई को शुरू हुआ था। 29-30 जून की रात 1.00 बजे ये काम पूरा हुआ जिसमें 337 टन कचरा जलाया गया। इससे पहले ट्रायल में 30 टन कचरा जलाया जा चुका था।
राख को सुरक्षित रखा गया
कचरा जलने के बाद जो राख बची, उसे बोरी में भरकर प्लांट के लीक-प्रूफ शेड में रखा गया है। अब इसे जमीन में दबाने के लिए खास लैंडफिल बनाया जा रहा है, जो नवंबर तक तैयार होगा और इस पूरे कचरे को दिसंबर तक सही तरीके से डिस्पोज किया जाएगा।
अतिरिक्त कचरे को 3 जुलाई तक सुरक्षित जलाकर राख कर दिया जाएगा।
भोपाल गैस त्रासदी – एक कला अध्याय
2-3 दिसंबर 1984 की रात को भोपाल के यूनियन कार्बाइड के कीटनाशक कारखाने से बेहद जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) का रिसाव हुआ, जो विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदियों में से एक थी। इसमें कम से कम 5,479 लोगों की मौत हुई और हजारों लोग विकलांग हो गए थे। इस त्रासदी का असर भोपाल में दिखता है जहां आज भी बच्चे विकलांग पैदा होते हैं।