2008 के मालेगांव विस्फोट मामले में बरी होने के बाद भारतीय जनता पार्टी की पूर्व सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने एक सनसनीखेज खुलासा किया है। उन्होंने दावा किया है कि जांच के दौरान उन पर राजनीतिक साजिश के तहत कई बड़े नामों को घसीटने का दबाव बनाया गया था। यह बयान ऐसे समय पर सामने आया है जब इस चर्चित विस्फोट मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत ने प्रज्ञा ठाकुर समेत सभी सात आरोपियों को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया है।
जांच में बनाया गया था राजनीतिक दबाव: प्रज्ञा ठाकुर का आरोप
प्रज्ञा ठाकुर ने मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि जब इस केस की जांच की जा रही थी, तब उनसे कई बार यह प्रयास किया गया कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत के नाम लें। उनके अनुसार, जांच एजेंसियों द्वारा राजनीतिक दबाव के तहत एक “हिंदू आतंकवाद” की कथा गढ़ने की कोशिश की जा रही थी, जिसमें उन्हें और उनके जैसे अन्य लोगों को बलि का बकरा बनाया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने हर बार इस दबाव का विरोध किया और स्पष्ट रूप से इन आरोपों को खारिज किया, क्योंकि उनका इन लोगों से कोई आपराधिक संबंध नहीं था। उनके अनुसार, यह सब एक सोची-समझी रणनीति थी ताकि देश के प्रमुख राष्ट्रवादी नेताओं की छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके।
एनआईए अदालत का फैसला: सभी आरोपी दोषमुक्त
इससे पहले गुरुवार को NIA की विशेष अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य इस मामले में आरोपियों को दोषी सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अदालत ने प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित, सुधाकर चतुर्वेदी, अजय राहिरकर, समीर कुलकर्णी, सुधाकर द्विवेदी और रमजी कालसांगरा को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।
मालेगांव विस्फोट में सितंबर 2008 में महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगांव शहर में एक धमाका हुआ था, जिसमें छह लोगों की मौत हुई थी और दर्जनों घायल हुए थे। इस मामले में कई सालों तक जांच चली, और यह केस देश में आतंकवाद और धार्मिक ध्रुवीकरण के बहुचर्चित उदाहरणों में से एक बन गया।
राजनीतिक साजिश या न्याय की जीत? बहस जारी
प्रज्ञा ठाकुर का यह बयान जहां एक ओर न्याय प्रणाली में विश्वास को मजबूती देने वाला माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह भी प्रश्न खड़े कर रहा है कि क्या जांच एजेंसियों पर राजनीतिक एजेंडा थोपने का प्रयास किया गया था? उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया और वर्षों तक बिना अपराध के जेल में रखा गया।
उनके अनुसार, अब जबकि अदालत ने उन्हें निर्दोष करार दिया है, उन्हें उन सभी लोगों से जवाब चाहिए जिन्होंने उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाए और उनकी छवि को सार्वजनिक रूप से नुकसान पहुंचाया। प्रज्ञा ठाकुर के इन बयानों ने न केवल इस केस को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है, बल्कि देश की राजनीतिक और न्यायिक व्यवस्था पर भी गंभीर बहस छेड़ दी है।