विश्व रेबीज़ दिवस: लक्षण दिखने पर लाइलाज, लेकिन टीकाकरण से 100% बचाव संभव!

हर साल 28 सितंबर को विश्व रेबीज़ दिवस मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को रेबीज़ जैसी जानलेवा बीमारी से बचाव और रोकथाम के प्रति जागरूक करना है। यह दिन फ्रांसीसी जीवविज्ञानी लुई पाश्चर की पुण्यतिथि को चिह्नित करता है, जिन्होंने पहला रेबीज़ टीका विकसित किया था।

रेबीज़ एक विषाणुजनित रोग है, जो आमतौर पर संक्रमित गर्म रक्त वाले जानवरों (कुत्ते, बिल्ली, बंदर आदि) के काटने, खरोंचने या चाटने से फैलता है। यह वायरस केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है, जिससे मस्तिष्क में सूजन आ जाती है, जो अंततः मृत्यु का कारण बनती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में हर साल हजारों लोग रेबीज़ के कारण अपनी जान गंवाते हैं। चिंताजनक बात यह है कि रेबीज़ से मरने वालों में बच्चों की संख्या सबसे अधिक होती है, क्योंकि वे अक्सर जानवरों के साथ खेलते समय जोखिम को नहीं समझते।

रोकथाम ही एकमात्र सुरक्षा कवच: विशेषज्ञों का कहना है कि एक बार लक्षण (जैसे हाइड्रोफोबिया या पानी से डर) दिखने के बाद रेबीज़ लगभग लाइलाज है। यही कारण है कि रोकथाम ही इसका सबसे बड़ा और एकमात्र इलाज है। यह बीमारी पूरी तरह से रोकी जा सकती है।

रेबीज़ के खतरे को समाप्त करने के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:

  1. पशु टीकाकरण: पालतू जानवरों, खासकर कुत्तों का नियमित टीकाकरण सुनिश्चित करें। यह मानव में संक्रमण को रोकने का प्राथमिक तरीका है।
  2. काटने पर तुरंत कार्रवाई: यदि कोई जानवर काट ले या खरोंच दे, तो घाव को तुरंत साबुन और बहते पानी से 15 मिनट तक धोएँ।
  3. तत्काल चिकित्सा: बिना किसी देरी के डॉक्टर से संपर्क करें और रेबीज़ का टीका (वैक्सीन) लगवाएँ। यह पोस्ट-एक्सपोज़र प्रोफेलेक्सिस (PEP) जीवनरक्षक होता है।

विश्व रेबीज़ दिवस हमें यह याद दिलाता है कि थोड़ी सी जागरूकता और समय पर कदम उठाकर हम ‘एक स्वास्थ्य’ (One Health) दृष्टिकोण के तहत रेबीज़ को खत्म करने के वैश्विक लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं और कई अनमोल जिंदगियाँ बचा सकते हैं।