स्मार्ट सिटी सिर्फ़ नाम की, ऐप तो बन गए, पर उन्हें चलाने वाला कोई नहीं

भोपाल। स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत, सबसे पहला प्रोजेक्ट एक ऐप था। भोपाल प्लस ऐप को ₹3.98 करोड़ की लागत से विकसित किया गया था। दावा किया गया था कि 99-लेयर वाला यह ऐप शहर के हर निवासी को फ़ायदा पहुँचाएगा और किसी और ऐप की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

एक निजी एजेंसी के इंफ्रास्ट्रक्चर पर बना यह ऐप, सिर्फ़ दो साल बाद ही बंद हो गया। जैसे ही निजी एजेंसी ने ऐप को अपडेट करना बंद किया, यह सर्वर से डिस्कनेक्ट हो गया, जिससे यह बेकार हो गया। शहर के दूसरे सार्वजनिक ऐप्स का भी यही हाल है। स्मार्ट सिटी ने खुद एक निजी एजेंसी के साथ मिलकर मेयर एक्सप्रेस ऐप लॉन्च किया था। 

इसका उद्देश्य इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर और बढ़ई जैसी सेवाएँ प्रदान करना था। निजी एजेंसी के ज़रिए लॉन्च किया गया यह ऐप एक साल के अंदर ही बंद हो गया। इससे जुड़ा एक पोर्टल भी बंद पड़ा है। ज़िले के लगभग 40 विभागों ने 200 से ज़्यादा मोबाइल ऐप विकसित किए। इसका उद्देश्य विभाग की सेवाओं को जनता तक पहुँचाना था। 50 करोड़ रुपए से ज़्यादा खर्च होने के बावजूद बुनियादी ढाँचा विकसित नहीं हो पाया है। सर्वर और अन्य मामलों में लापरवाही के चलते ज़िले के आधे ऐप्स पूरी तरह से बंद हो गए हैं। समय पर अपडेट न होने के कारण 30 प्रतिशत बेकार हो गए हैं। सिर्फ़ 20 प्रतिशत ही लाभ दे रहे हैं।