अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा के खिलाफ सड़क पर उतरे नागरिक

अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण को लेकर चल रही दशकों पुरानी जंग अब एक निर्णायक और विवादास्पद मोड़ पर पहुँच गई है। केंद्र सरकार द्वारा पहाड़ियों की सुझाई गई ‘नई परिभाषा’ को सर्वोच्च न्यायालय की हरी झंडी मिलने के बाद देश भर के पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों में भारी आक्रोश है।

विवाद की मुख्य जड़: ‘100 मीटर’ का पैमाना

हालिया फैसले के तहत अब केवल 100 मीटर से ऊंचे क्षेत्रों को ही आधिकारिक तौर पर ‘पहाड़ी’ माना जाएगा और उन्हें कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि यह पैमाना वैज्ञानिक नहीं बल्कि प्रशासनिक है, जिसे अरावली के विनाश की पटकथा के रूप में देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों और प्रदर्शनकारियों की चिंताएं

आंदोलनकारियों का मानना है कि इस नई परिभाषा से अरावली का एक बड़ा हिस्सा रातों-रात ‘गैर-पहाड़ी’ घोषित हो जाएगा। इसके संभावित परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं:

  • माफियाओं का बोलबाला: ऊंचाई के इस नए पैमाने का सीधा लाभ भू-माफियाओं और खनन माफियाओं को मिलेगा, जिससे अब तक सुरक्षित रही निचली पहाड़ियों पर अंधाधुंध निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा।
  • पारिस्थितिक तंत्र को क्षति: अरावली की तलहटी और छोटी पहाड़ियां वन्यजीवों के लिए गलियारे (Corridors) का काम करती हैं। इनके खत्म होने से जैव विविधता पूरी तरह नष्ट हो जाएगी।
  • रेगिस्तान का विस्तार: अरावली थार मरुस्थल की धूल भरी आंधियों को दिल्ली-एनसीआर की ओर आने से रोकने वाली एकमात्र प्राकृतिक दीवार है।

‘ग्रीन लंग्स’ को बचाने की पुकार

विरोध प्रदर्शनों में शामिल विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि पूरी पर्वत श्रृंखला को संरक्षित नहीं किया गया, तो उत्तर भारत में भूजल स्तर (Groundwater level) गंभीर रूप से गिर जाएगा। अरावली न केवल इस क्षेत्र के लिए ‘ग्रीन लंग्स’ है, बल्कि यह करोड़ों लोगों के लिए जल पुनर्भरण (Water Recharge) का मुख्य स्रोत भी है।

प्रमुख मांगें

प्रदर्शनकारी नागरिकों ने सरकार और न्यायालय से निम्नलिखित मांगें की हैं:

  1. ऊंचाई आधारित परिभाषा को तत्काल वापस लिया जाए।
  2. पूरी अरावली श्रृंखला को ‘पूर्ण संरक्षित पर्यावरणीय क्षेत्र’ घोषित किया जाए।
  3. पर्यावरण सुरक्षा को प्रशासनिक आंकड़ों के बजाय पारिस्थितिक महत्ता के आधार पर तय किया जाए।

नागरिकों का स्पष्ट संदेश है कि यदि पहाड़ियों की प्राकृतिक गरिमा से छेड़छाड़ की गई, तो आने वाली पीढ़ियों को पानी और शुद्ध हवा के लिए भारी कीमत चुकानी होगी।