सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी तीसरे पक्ष की एजेंसी या ठेकेदार के माध्यम से काम पर रखे गए कर्मचारी सरकारी विभागों या स्थानीय निकायों के नियमित कर्मचारियों के बराबर दर्जा, वेतन या अन्य लाभों का दावा नहीं कर सकते। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि सरकारी नौकरियां सार्वजनिक संपत्ति की तरह हैं, जिनमें भर्ती पूरी पारदर्शिता और योग्यता के आधार पर होती है।
अदालत ने जोर दिया कि नियमित कर्मचारियों की नियुक्ति में संवैधानिक प्रक्रियाएं और सुरक्षा उपाय लागू होते हैं, ताकि चयन में कोई पक्षपात या अनियमितता न हो। वहीं, ठेकेदार या मैनपावर एजेंसी के जरिए रखे गए कर्मचारियों की नियुक्ति पूरी तरह नियोक्ता की मर्जी पर निर्भर करती है। यदि दोनों श्रेणियों के बीच अंतर मिटा दिया जाए, तो स्थायी, अनुबंध और अस्थायी भर्ती की मूल अवधारणा ही कमजोर हो जाएगी।
यह फैसला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के 2018 के उस आदेश को पलटते हुए आया है, जिसमें नंदयाल नगरपालिका परिषद (कुरनूल जिला) को ठेकेदार के माध्यम से नियुक्त सफाई कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों के समकक्ष न्यूनतम समय-स्केल वेतन और वार्षिक वृद्धि देने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया और माना कि नगर निगम और इन कर्मचारियों के बीच कोई सीधा नियोक्ता-कर्मचारी संबंध नहीं है।
मामले में 1994 से विभिन्न ठेकेदारों के जरिए काम कर रहे दर्जनों सफाई कर्मचारियों ने नियमित सेवा के लाभ मांगे थे। ट्रिब्यूनल ने उनकी मांग खारिज की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने नगर निगम की अपील को मंजूर करते हुए कहा कि ठेकेदार के कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों जैसा दर्जा देना मनमानी भर्ती प्रक्रिया को वैधता प्रदान करने के समान होगा।