भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वर्ष 2026 की अपनी पहली मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक में रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करने का फैसला किया है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को घोषणा की कि रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर ही यथावत रखा जाएगा।
यह फैसला केंद्रीय बजट 2026 और हाल ही में भारत-अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते के बाद आया है, जिसकी वजह से शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था से जुड़े विशेषज्ञों की नजर इस नीतिगत समीक्षा पर टिकी हुई थी।
गवर्नर संजय मल्होत्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि देश में खुदरा महंगाई दर आरबीआई के निर्धारित दायरे के अंदर बनी हुई है। उन्होंने वर्तमान स्थिति को ‘उच्च आर्थिक वृद्धि और निम्न मुद्रास्फीति’ का अनुकूल चरण करार दिया। वैश्विक स्तर पर मौजूद अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है और भविष्य में भी स्थिरता बरकरार रहने की संभावना है।
आरबीआई ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए जीडीपी वृद्धि के अनुमान को 7.3 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.4 प्रतिशत कर दिया है। हालांकि, नई जीडीपी सीरीज के कारण पूरे वर्ष का एकल अनुमान जारी नहीं किया गया। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के लिए 6.9 प्रतिशत और दूसरी तिमाही के लिए 7.0 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है।
अर्थशास्त्रियों के एक हालिया सर्वे में अधिकांश विशेषज्ञों ने ब्याज दरों में कटौती के प्रति सतर्क रवैया अपनाने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि जब तक आर्थिक विकास में गंभीर मंदी का खतरा स्पष्ट न हो, तब तक दरों को कम नहीं किया जाना चाहिए। यह सर्वे अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए शुल्क को 18 प्रतिशत तक घटाने की घोषणा से पहले किया गया था।
रेपो रेट वह दर है, जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण उपलब्ध कराता है। इसका सीधा प्रभाव आम लोगों के लोन और बचत पर पड़ता है। रेपो रेट में वृद्धि होने पर होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ईएमआई बढ़ जाती है, जबकि इसमें कमी आने पर ईएमआई सस्ती हो सकती है, लेकिन फिक्स्ड डिपॉजिट और बचत खाते पर मिलने वाला ब्याज भी कम हो सकता है।
पिछले कुछ फैसलों की बात करें तो दिसंबर 2025 में 25 आधार अंकों की कटौती की गई थी। इससे पहले जून 2025 में 50 आधार अंकों और फरवरी तथा अप्रैल 2025 में 25-25 आधार अंकों की कटौती हुई थी। उसके पहले लगातार 11 मौद्रिक नीति बैठकों में रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया था।