गुरुवार को लोकसभा में महिला आरक्षण कानून से संबंधित तीन महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पेश किए गए। विधेयकों के पेश होते ही विपक्षी दलों ने इनका जोरदार विरोध शुरू कर दिया और इन्हें संविधान की मूल भावना के विरुद्ध बताया।
सबसे पहले कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने इन विधेयकों का विरोध करते हुए दावा किया कि सरकार संविधान को ‘हाइजैक’ करने की कोशिश कर रही है। इसके बाद समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने भी आपत्ति जताई और कहा कि जब तक मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान नहीं किया जाता, तब तक इस कानून का कोई मतलब नहीं है।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश की आधी आबादी को आरक्षण देने की बात की जा रही है, लेकिन मुस्लिम महिलाओं को इसमें क्या हिस्सेदारी मिलेगी, यह स्पष्ट नहीं है।
इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने साफ जवाब देते हुए कहा कि संविधान में धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार का आरक्षण देना असंवैधानिक है, इसलिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया जा सकता। अमित शाह ने तंज कसते हुए कहा कि अगर समाजवादी पार्टी मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देना चाहती है तो वह अपनी सभी चुनावी टिकटें उन्हें दे सकती है।
प्रस्तावित संशोधनों के मुताबिक, लोकसभा की कुल सदस्य संख्या बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान है, जिसमें राज्यों के लिए 815 और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 सीटें रखी जाएंगी। परिसीमन के बाद इनमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी।
विधेयकों को पुनर्स्थापित करने के लिए पहले ध्वनि मत से इन्हें पारित करने की कोशिश की गई, लेकिन विपक्ष की मांग पर मत विभाजन कराया गया। मतदान में 207 सांसदों ने पक्ष में वोट दिया, जबकि 126 सांसदों ने विरोध में वोट डाला।
बहस के दौरान AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इन विधेयकों का विरोध करते हुए कहा कि यह सिर्फ महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के संघीय ढांचे के खिलाफ भी है। वहीं, DMK सांसद टी.आर. बालू ने इन्हें ‘सैंडविच बिल’ करार दिया और कहा कि तीनों विधेयक आपस में जुड़े हुए हैं, इसलिए उनकी पार्टी इनका विरोध करती है।
इस दौरान अखिलेश यादव ने सरकार पर जनगणना न कराने का आरोप लगाया। जवाब में अमित शाह ने कहा कि देश में जनगणना की प्रक्रिया चल रही है और भविष्य में जाति आधारित आंकड़ों को भी इसमें शामिल किया जाएगा।