मनुस्मृति एक बार फिर चर्चा में है। ऐसा इसलिए क्योंकि केंद्र सरकार द्वारा तैयार श्रम नीति 2025 के मसौदे में इसका ज़िक्र किया गया है। मसौदे में कहा गया है कि मनुस्मृति यह भी बताती है कि मज़दूरी कैसे निर्धारित की जानी चाहिए और मज़दूरों के हितों की रक्षा कैसे की जानी चाहिए। कई कांग्रेस नेताओं ने इस मामले पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि जाति-भेदभाव वाली मनुस्मृति का हवाला देना गलत है। यह उनके मूल्यों और उस तरह के समाज को दर्शाता है जिसे वे बनाना चाहते हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि मनुस्मृति के सिद्धांतों की ओर यह वापसी आरएसएस की सबसे प्रिय परंपराओं के अनुरूप है। आख़िरकार, संविधान को अपनाने के तुरंत बाद ही आरएसएस ने इस आधार पर संविधान पर हमला बोला था कि भारतीय संविधान मनुस्मृति में निहित मनु के आदर्शों और मूल्यों से प्रेरणा नहीं लेता।
ड्राफ्ट पॉलिसी में इन ग्रंथों का उल्लेख
इसके अलावा, ग्रंथों का हवाला देते हुए, इसमें कहा गया है, “मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति, शुक्रनीति और अर्थशास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों ने राजधर्म की अवधारणा के माध्यम से श्रम को परिभाषित किया है। उन्होंने न्याय, उचित मजदूरी और श्रमिकों को शोषण से बचाने के कर्तव्य पर ज़ोर दिया है। इन प्रारंभिक ग्रंथों ने आधुनिक श्रम कानून के उदय से सदियों पहले भारत के सभ्यतागत ताने-बाने में श्रम शासन के नैतिक आधारों को समाहित कर दिया था।” मसौदे में कहा गया है कि हमारे ग्रंथों ने मजदूरी न्याय पर ज़ोर दिया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि एक श्रमिक को समय पर उसकी मजदूरी मिलनी चाहिए और यही न्याय है। ऐसा न करने को अन्याय माना जाता था।