श्रीलंका को चक्रवात ‘दितवाह’ ने भारी तबाही के मुहाने पर ला खड़ा किया है। तेज हवाओं, मूसलाधार बारिश, बाढ़ और भूस्खलन के कारण पूरे द्वीप में व्यापक विनाश हुआ है। आपदा प्रबंधन केंद्र के अनुसार रविवार सुबह तक कम से कम 150 लोगों की मौत हो चुकी है, 130 से अधिक लापता हैं और दो लाख से ज्यादा लोग (लगभग 61,000 परिवार) प्रभावित हुए हैं। सबसे ज्यादा नुकसान पूर्वी तट, मध्य पहाड़ी इलाकों जैसे बदुल्ला और नुवारा एलिया तथा राजधानी कोलंबो में हुआ है, जहां सड़कें पानी में डूब गईं और लोग नावों से आना-जाना करने को मजबूर हैं। केलानी नदी का जलस्तर खतरे के निशान से काफी ऊपर चला गया, जिससे सैकड़ों परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया। छह सौ से अधिक घर पूरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं, हजारों लोग बेघर हो गए हैं, बिजली गुल है, सड़कें और रेल सेवाएं ठप हैं तथा सभी स्कूल-कार्यालय बंद हैं।
चक्रवात 24 नवंबर से सक्रिय था, 26 नवंबर को पूर्वी तट से टकराया और 28 नवंबर से भारी बारिश व 50-70 किमी प्रति घंटे की रफ्तार वाली हवाओं ने कहर बरपाना शुरू कर दिया। कई जगहों पर 24 घंटे में 300 मिलीमीटर से अधिक बारिश दर्ज की गई, जिसने बाढ़ और भूस्खलन को और भयावह बना दिया। अब ज्यादातर इलाकों में बारिश थम गई है, हालांकि उत्तरी हिस्सों में हल्की वर्षा अभी भी जारी है। चक्रवात अब भारत की ओर बढ़ रहा है, लेकिन श्रीलंका में सेना और राहत दल दिन-रात बचाव कार्यों में जुटे हैं।
भारत ने तुरंत मदद का हाथ बढ़ाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संवेदना जताते हुए ‘ऑपरेशन सागर बंधु’ शुरू किया। भारतीय वायुसेना के विमानों से 21 टन खाद्यान्न, दवाइयां, कंबल और 8 टन विशेष उपकरण कोलंबो पहुंचाए गए। एनडीआरएफ की दो टीमों में 80 जवान (4 महिलाएं और 4 स्निफर डॉग सहित) शनिवार को ही रवाना होकर मौके पर पहुंच चुके हैं और सक्रिय रूप से राहत व बचाव कार्य कर रहे हैं। करीब तीन सौ भारतीय नागरिक भी प्रभावित क्षेत्रों में फंसे हुए हैं, उनकी सुरक्षित वापसी के लिए प्रयास जारी हैं। भारत की यह त्वरित सहायता एक बार फिर ‘पड़ोसी पहले’ नीति का जीवंत उदाहरण बन गई है।