रीवा में 5 बच्चों की ज़िंदगी दांव पर: दुर्लभ बीमारी से जूझते परिवार की गुहार, सरकारी वादे हवा हुए

Rare disease in Rewa: मध्य प्रदेश के रीवा जिले से एक हृदय विदारक खबर सामने आई है, जहां मनगवां विधानसभा के बांस गांव में महेश साकेत के परिवार के पांच बच्चे कॉपर डिस्टोनिया नामक एक दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे हैं। चार साल पहले बीमारी की पुष्टि होने के बावजूद, इन बच्चों को अब तक समुचित इलाज नहीं मिल पाया है। स्थिति इतनी गंभीर है कि दो बच्चों की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है, जबकि बाकी तीन की तबीयत भी लगातार बिगड़ रही है। परिवार का आरोप है कि जांच रिपोर्ट तक उन्हें नहीं सौंपी गई है और नेता-अधिकारियों ने केवल आश्वासन देकर पल्ला झाड़ लिया है। इलाज के अभाव में बच्चों की हड्डियां सूखकर कंकाल मात्र रह गई हैं।

जनप्रतिनिधियों के आश्वासन और जमीनी हकीकत

दैनिक भास्कर की टीम जब बच्चों के माता-पिता की आपबीती सुनने उनके घर पहुंची, तो बच्चों की मां कैमरे पर बात करते हुए लगातार रोती रहीं। वे बार-बार यह दोहरा रही थीं कि “लग रहा है अब हमारे बच्चे बचेंगे नहीं…”। यह दर्दनाक मंजर सरकारी तंत्र की उदासीनता को बयां करता है।

जनवरी में जब यह मामला सुर्खियों में आया था, तो मनगवां से भाजपा विधायक नरेंद्र प्रजापति ने मीडिया के सामने यह भरोसा दिलाया था कि बच्चों का इलाज जहां भी संभव होगा, कराया जाएगा। उन्होंने दिल्ली या देश के किसी भी कोने में बेहतर इलाज के लिए बच्चों को भेजने की बात कही थी और यहां तक दावा किया था कि स्वास्थ्य मंत्री से चर्चा हो चुकी है और करोड़ों रुपए खर्च कर भी बच्चों को स्वस्थ किया जाएगा। उन्होंने परिवार को निश्चिंत रहने को कहा था।

लेकिन इन आश्वासनों के पांच महीने बीत जाने के बाद भी, जब दैनिक भास्कर टीम रीवा मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर बांस गांव पहुंची, तो परिवार रोता-बिलखता मिला।

बढ़ती शारीरिक दुर्बलता और अनहोनी का डर

बच्चों के माता-पिता के अनुसार, पांच में से दो बच्चों की हालत बेहद नाजुक है, जबकि अन्य तीनों की स्थिति भी दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। पहले हुई जांच में डॉक्टरों ने बीमारी को ‘कॉपर डिस्टोनिया’ बताया था। हालांकि, हाल ही में स्थानीय विधायक नरेंद्र प्रजापति ने बिना रिपोर्ट देखे सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में इस बीमारी को ‘मस्कुलर डिस्ट्रॉफी’ लिख दिया, जिससे और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। जबकि 14 जनवरी को दिए गए अपने बयान में विधायक ने खुद बीमारी का नाम ‘कॉपर डिस्टोनिया’ ही बताया था।

माता-पिता का कहना है कि हर गुजरते दिन के साथ बच्चों का शरीर धीरे-धीरे सूख रहा है और वे हड्डियों के ढांचे में तब्दील होते जा रहे हैं। मांसपेशियों में ऐंठन लगातार बढ़ रही है, जिससे बच्चों को असहनीय पीड़ा हो रही है। इलाज की उम्मीद में बच्चों की जांच कराई गई थी, लेकिन पांच महीने बीत जाने के बाद भी उन्हें जांच रिपोर्ट तक नहीं सौंपी गई। उन्होंने बताया, “इलाज शुरू होना तो दूर, अब तो हर दिन बिगड़ती हालत देख अनहोनी का डर सताता है।”

मीडिया की दखलंदाजी और सरकारी उदासीनता

महेश साकेत ने बताया कि लगभग छह महीने पहले जब यह मामला मीडिया में आया था, तब स्थानीय विधायक मिलने आए और हर तरह के इलाज का आश्वासन देकर गए। तत्काल स्वास्थ्य विभाग की टीम भी आई और बच्चों को जिला अस्पताल, फिर संजय गांधी अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन इन अस्पतालों में इस दुर्लभ बीमारी का इलाज संभव नहीं हो पाया।

इसके बाद बच्चों को भोपाल एम्स रेफर कर दिया गया। महेश के अनुसार, वहां भी इस बीमारी का इलाज नहीं मिला और केवल एक बच्चे का ही इलाज किया गया, जबकि बाकी चार बच्चों का इलाज तक शुरू नहीं हुआ। उन्होंने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि “बहुत से लोग आए, तस्वीरें खिंचवाईं और चले गए, लेकिन किसी ने भी बच्चों का इलाज नहीं करवाया।”

महेश ने यह भी बताया कि भोपाल एम्स में सभी बच्चों के सैंपल जांच के लिए लिए गए थे, लेकिन पांच महीने से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी जांच रिपोर्ट नहीं मिली है। उन्हें 14 दिनों तक वहां रखा गया और फिर वापस भेज दिया गया। अब वे बार-बार केवल यही जानने के लिए फोन करते हैं कि आखिर रिपोर्ट कब मिलेगी।

जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी

पीड़ित बच्चों के पिता ने बताया कि अब तो हालात ऐसे हो गए हैं कि विधायक सहित अन्य जिम्मेदार अधिकारियों ने फोन उठाना तक बंद कर दिया है। गंगेव स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टरों ने तो उनका नंबर ही ब्लैकलिस्ट कर दिया है। इस बात की पुष्टि करने के लिए दैनिक भास्कर टीम ने महेश से तुरंत स्वास्थ्य अधिकारियों को कॉल करने को कहा। महेश ने मौके पर ही रीवा सीएमएचओ (मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी) और गंगेव स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर को कॉल किया, लेकिन सीएमएचओ ने न तो कॉल उठाया और न ही कोई जवाब दिया। वहीं, गंगेव स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर का नंबर हर बार व्यस्त बताता रहा। महेश ने बताया, “महीनों से डॉक्टर से कभी बात नहीं हो पाई। उनका कहना है, नंबर ब्लैकलिस्ट में होने के कारण कॉल हमेशा व्यस्त (एंगेज) बताता है।

रीवा का एक और परिवार मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से जूझ रहा

रीवा जिले से इसी तरह की एक और दुखद खबर सामने आई है, जहां एक अन्य परिवार भी कई वर्षों से मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है। जिले के त्योंथर विधानसभा क्षेत्र में रहने वाले रामनरेश यादव (61), उनकी बेटी और तीन बेटे इस गंभीर बीमारी की चपेट में हैं। रामनरेश में बीमारी के आंशिक लक्षण दिखे थे, और जन्म के बाद उनकी बेटी सुशीला यादव (39) भी इससे पीड़ित हो गईं।

इसके बाद 1998 से 2003 के बीच जन्मे उनके तीन बेटों – अनीश यादव (26), मनीष यादव (24) और मनोज यादव (20) में भी उम्र बढ़ने के साथ बीमारी के लक्षण स्पष्ट दिखने लगे। तीनों का शरीर धीरे-धीरे सूखने लगा और कमजोरी बढ़ती गई। हालांकि, रामनरेश के दो बड़े बेटे और एक बेटी इस बीमारी से प्रभावित नहीं हुए हैं।

राजनीतिक आश्वासन और जमीनी शून्य

2023 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी इस परिवार की पीड़ा का पता चला। उन्होंने मनीष यादव से फोन पर बात कर पूरी जानकारी ली और इलाज का भरोसा दिया। इलाज के लिए कलेक्टर के माध्यम से तैयारियां भी शुरू हुईं, लेकिन आज तक इलाज की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी है।

परिवार की स्थिति जस की तस बनी हुई है। कांग्रेस नेता उमंग सिंगार और समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मनोज सिंह काका भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इस परिवार के तीनों भाइयों का वीडियो साझा कर चुके हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को टैग करते हुए जल्द से जल्द इलाज की मांग की है।

ये दोनों मामले मध्य प्रदेश के रीवा जिले में दुर्लभ और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे परिवारों की दर्दनाक हकीकत को उजागर करते हैं, जहां सरकारी वादे और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ी खाई है। इन परिवारों को तत्काल मदद और उचित इलाज की सख्त जरूरत है।