Shashi Tharoor on Emergency: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर एक बार फिर अपने बेबाक बयानों के लिए सुर्खियों में हैं. इस बार उन्होंने भारत के इतिहास के सबसे विवादास्पद दौर, आपातकाल, की कड़े शब्दों में निंदा की है, इसे एक “काला अध्याय” करार दिया है. थरूर ने स्पष्ट किया कि 1975 में देश ने देखा कि कैसे स्वतंत्रता का हरण किया जा सकता है, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि आज का भारत 1975 से बहुत अलग और अधिक परिपक्व है.
यह पहली बार नहीं है जब थरूर ने अपनी पार्टी की स्थापित रेखा से हटकर बयान दिया हो. पूर्व में भी वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की प्रशंसा कर चुके हैं, और “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष रखने वाली सांसदों की टीम में भी शामिल थे, जहां उन्होंने मोदी सरकार का मजबूती से समर्थन किया था.
“केवल एक काला अध्याय नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण सबक”
मलयालम दैनिक ‘दीपिका’ में आपातकाल पर प्रकाशित अपने लेख में, थरूर ने 25 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 तक तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल के उस भयावह दौर को याद किया. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आपातकाल को केवल भारतीय इतिहास के एक काले अध्याय के रूप में ही नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसके गहरे सबक को पूरी तरह से समझा जाना चाहिए. थरूर ने लिखा कि अनुशासन और व्यवस्था स्थापित करने के नाम पर किए गए प्रयास अक्सर क्रूरता और ज्यादती में बदल गए, जिन्हें किसी भी तर्क से उचित नहीं ठहराया जा सकता.
संजय गांधी का नसबंदी अभियान और झुग्गी-झोपड़ी विध्वंस: क्रूरता के उदाहरण
थरूर ने अपने लेख में संजय गांधी द्वारा चलाए गए जबरन नसबंदी अभियान को आपातकाल की क्रूरताओं के एक कुख्यात उदाहरण के रूप में रेखांकित किया. उन्होंने बताया कि कैसे गरीब ग्रामीण इलाकों में मनमाने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए हिंसा और जबरदस्ती का सहारा लिया गया. इसी तरह, नई दिल्ली जैसे शहरों में, झुग्गी-झोपड़ियों को बेरहमी से ध्वस्त कर दिया गया, जिससे हजारों लोग बेघर हो गए और उनके कल्याण की कोई चिंता नहीं की गई. ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि सत्ता के केंद्रीकरण से किस तरह की अमानवीयता सामने आ सकती है.
अधिक आत्मविश्वासी और मजबूत लोकतंत्र
कांग्रेस नेता ने लोकतंत्र के महत्व पर बल देते हुए कहा कि इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह एक अमूल्य विरासत है जिसे निरंतर पोषण और संरक्षण की आवश्यकता है. थरूर ने कहा, “इसे हर जगह के लोगों के लिए एक स्थायी प्रेरणा स्रोत के रूप में काम करने दें.” उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आज का भारत 1975 का भारत नहीं है. उनका मानना है कि वर्तमान में हम अधिक आत्मविश्वासी, अधिक विकसित और कई मायनों में अधिक मजबूत लोकतंत्र हैं. हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि आपातकाल के सबक आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं, खासकर उन तरीकों से जिनसे सत्ता के दुरुपयोग का खतरा बना रहता है.
लोकतंत्र के प्रहरी हमेशा सतर्क रहें: थरूर की चेतावनी
थरूर ने अपनी टिप्पणी में आगाह किया कि सत्ता को केंद्रीकृत करने, असहमति को दबाने और संवैधानिक सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने का प्रलोभन विभिन्न रूपों में प्रकट हो सकता है. उन्होंने कहा कि अक्सर ऐसी प्रवृत्तियों को राष्ट्रीय हित या स्थिरता के नाम पर उचित ठहराया जाता है. इस लिहाज से, आपातकाल एक कठोर चेतावनी के रूप में कार्य करता है. थरूर ने निष्कर्ष निकाला, “लोकतंत्र के रक्षकों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए,” ताकि अतीत की गलतियों को दोहराया न जा सके.