सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मध्य प्रदेश के 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण केस में सरकार ने फिर सुनवाई के लिए समय मांग लिया। आखिरकार सुनवाई बिहार चुनाव की वोटिंग तक टल गई है।
नई दिल्ली/भोपाल, ब्यूरो: सरकारी अधिवक्ताओं की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की तारीख नवंबर के दूसरे सप्ताह में कर दी है, यानी तब तक बिहार चुनाव 2025 की वोटिंग हो चुकी होगी। उल्लेखनीय है कि बिहार में 6 व 11 नवंबर को वोटिंग और 14 नवंबर को रिजल्ट है।
सुनवाई शुरू होते ही मांग ली तारीख
सुनवाई के लिए सुबह 10.30 बजे जैसे ही बेंच शुरू हुई, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसमें समय देने की मांग की। उन्होंने कहा कि अभी कुछ मुद्दों पर आपस में चर्चा करना है, इसलिए छुट्टियों के बाद इसमें समय दे सकें। अनारक्षित पक्ष ने कहा कि बेहतर होगा इसे खत्म किया जाए। इस पर ओबीसी वेलफेयर कमेटी की ओर से कहा गया कि इसे सुना जाए। इस पर मेहता ने कहा कि आगे बढ़ा दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कब सुनवाई चाहेंगे आप, इस पर उन्होंने कहा कि नवंबर में पहले या दूसरे सप्ताह में। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर में दूसरे सप्ताह में रख दिया। इसके पहले भी मेहता ने 8 अक्टूबर की सुनवाई में भी अधिक समय की मांग की थी लेकिन तब सुप्रीम कोर्ट ने इसमें एक दिन की ही मोहलत देते हुए 9 अक्टूबर गुरुवार की तारीख लगा दी थी। लेकिन फिर मेहता ने सुनवाई होते ही तारीख बढ़ाने की मांग कर दी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा फाइनल हियरिंग होगी
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा कि ठीक है, अभी छुट्टियां लग जाएंगी तो आप बताइए क्या संभावित समय बताएं। मेहता ने कहा कि नवंबर पहले या दूसरे सप्ताह में। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दूसरे सप्ताह नवंबर रख रहे हैं लेकिन यह फाइनल हियरिंग होगी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट में केस वापस करने को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई। दो मिनट की सुनवाई में डेट आगे बढ़ गई।
ओबीसी कमेटी ने कहा कि हाईकोर्ट के स्टे हटा दीजिए
इस पर ओबीसी वेलफेयर कमेटी के अधिवक्ता वरूण ठाकुर ने कहा कि कम से कम
हाईकोर्ट के स्टे को हटा दीजिए, एक्ट कहीं भी चैलेंज नहीं है। स्टे हटा दीजिए ताकि एक्ट
के तहत भर्ती हो सके। लेकिन इस पर बेंच ने कोई जवाब नहीं दिया।
केस एमपी हाईकोर्ट जाएगा या नहीं यह तय नहीं
यह केस अब हाईकोर्ट में वापस जाएगा या नहीं यह तय नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर गुरुवार को कोई बात नहीं हुई। इसके पहले बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि क्यों ना केस को हाईकोर्ट भेज दें, क्योंकि आरक्षण स्थानीय मुद्दे, टोपोग्राफी, जनसंख्या इन सभी से जुड़ा
होता है और यह हाईकोर्ट बेहतर समझ सकता है। इस पर बात आई थी कि हाईकोर्ट ने कई याचिकाओं में स्टे दे दिया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हम स्टे वेकेट करके इसे रिवर्ट कर देते हैं। इस पर अनारक्षित पक्ष को आपत्ति थी क्योंकि स्टे हटने का मतलब था कि मप्र में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण लागू हो जाएगा। पांच मिनट की सुनवाई के बाद तय हुआ कि इस मुद्दे को प्रैक्टिकली देखा जाएगा और 9 अक्टूबर को सुनेंगे, लेकिन फिर सरकार ने समय मांग लिया।
प्रदेश सरकार लगातार समय मांग रही है
सरकार इस मामले में लगातार समय मांग रही है। पहले हाईकोर्ट ने इसमें ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने पर रोक लगाई और फिर इसमें सुनवाई की जगह शासन ने ट्रांसफर याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर कर दी। इसके बाद इन्हें खारिज किया गया और हाईकोर्ट फिर भेजा गया लेकिन फिर वहां से सुप्रीम कोर्ट में दूसरी ट्रांसफर याचिकाएं लगाई गई। हाईकोर्ट में हर बार शासन ने यह कहा कि एपेक्स कोर्ट में केस है, इसलिए सुनवाई नहीं हो सकती है। इसके बाद मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में सुना गया और सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब अंतरिम राहत नहीं देंगे अंतिम फैसला देंगे। लेकिन 8 अक्टूबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने अचानक कहा कि क्यों ना इसे हाईकोर्ट भेज दिया। लेकिन 9 अक्टूबर को हाईकोर्ट भेजने पर कोई चर्चा नहीं हुई