दिल का दौरा अब युवाओं पर भी भारी, जीएमसी ने बनाया ‘गोल्डन आवर’ प्रोटोकॉल

भोपाल: दिल का दौरा अब सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि युवाओं के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है। गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) भोपाल में आने वाले हार्ट अटैक मरीजों में से आधे 49 साल से कम उम्र के हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अटैक आने के बाद शुरुआती दो घंटे यानी ‘गोल्डन आवर’ सबसे अहम होते हैं। इस समय पर एंजियोप्लास्टी हो जाए तो दिल पर असर नहीं पड़ता और जिंदगी बचने की संभावना चार गुना तक बढ़ जाती है।

इसी को ध्यान में रखते हुए जीएमसी के कार्डियोलॉजी विभाग ने गोल्डन आवर मैनेजमेंट का नया प्रोटोकॉल तैयार किया है। इसे 15 अक्टूबर को एडवांस कैथलैब के शुभारंभ के साथ लागू किया जाएगा। 1 अक्टूबर से ट्रायल रन शुरू होगा।

देरी से बिगड़ी 37 वर्षीय मरीज की हालत

कोलार निवासी 37 वर्षीय युवक को हाल ही में अचानक सीने में दर्द हुआ। जब वे हमीदिया अस्पताल पहुंचे तो सामान्य दिखने के कारण उन्हें तुरंत प्राथमिकता नहीं दी गई। आधे घंटे बाद जांच हुई तो हार्ट अटैक की पुष्टि हुई। इसके बाद उन्हें करीब 750 मीटर दूर पुरानी कैथलैब तक स्ट्रेचर पर ले जाया गया।

जांच के बाद स्टेंट तो डाला गया, लेकिन गोल्डन आवर निकल चुका था, जिससे हार्ट की मांसपेशियां रिवाइव नहीं हो सकीं। डॉक्टरों ने चेताया कि उन्हें आगे भी दिल से जुड़ी समस्याओं का खतरा बना रहेगा। यह स्थिति हर साल अस्पताल में आने वाले करीब 1200 मरीजों की कहानी है।

डॉक्टरों ने बताया क्यों जरूरी है त्वरित इलाज

कार्डियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अजय शर्मा ने कहा—
“हार्ट अटैक के दौरान ब्लॉकेज से दिल के हिस्से में खून नहीं पहुंचता। मसल्स डेड होने लगती हैं। यदि 2 घंटे के भीतर ब्लड सप्लाई बहाल हो जाए तो मसल्स रिवाइव हो सकती हैं और मरीज का दिल सामान्य स्थिति में लौट आता है।”

नया प्रोटोकॉल: मिनटों में जांच और इलाज

इमरजेंसी विभाग, एम्बुलेंस और भोपाल के अन्य अस्पतालों को जोड़ा जाएगा जैसे ही हार्ट अटैक का केस रिपोर्ट होगा, कार्डियोलॉजी टीम को पहले से सूचना दी जाएगी। कार्डियोलॉजी विभाग का एक डॉक्टर हमेशा ऑन-ड्यूटी रहेगा। कार्डियक मरीजों के लिए अलग लिफ्ट रिज़र्व की जाएगी।

गोल्डन आवर 90 मिनट (±30 मिनट) के भीतर मरीज का इलाज पूरा करने का लक्ष्य होगा।

अगला चरण: जिलों तक विस्तार

दूसरे चरण में आसपास के जिलों से आने वाले मरीजों को भी इस व्यवस्था में शामिल किया जाएगा। ऐसे मरीजों को रास्ते में ही टीएनके टीपीए इंजेक्शन दिया जाएगा, जिससे रक्त के थक्के घुल सकें और नुकसान कम हो।

पुरानी और नई कैथलैब का फर्क

अभी मरीजों को 750 मीटर लंबा और जोखिमभरा रास्ता तय करना पड़ता है, जिससे 15–20 मिनट लग जाते हैं। नई कैथलैब नए भवन की तीसरी मंजिल पर बनेगी, जो कार्डियक आईसीयू से सिर्फ 70 फीट की दूरी पर होगी। इससे मरीज को सेकंड्स में आईसीयू से लैब तक पहुंचाया जा सकेगा। नई मशीन एडवांस होगी, जिससे इलाज तेज और सटीक होगा।