सुप्रीम कोर्ट: ‘कुत्ते का मूड कौन पढ़ सकता है?’, स्कूल-कोर्ट में आवारा कुत्तों पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों की समस्या पर जारी स्वत संज्ञान मामले की सुनवाई में गंभीर चिंता जताई। तीन जजों की बेंच ने कहा कि कुत्ते का मन पढ़ना असंभव है – पता नहीं कब वह काटने के मूड में आ जाए। कोर्ट ने पूछा कि स्कूलों, अस्पतालों, कोर्ट परिसरों और अन्य संस्थागत क्षेत्रों में इन कुत्तों की मौजूदगी क्यों जरूरी है? ये जगहें सुरक्षित रहनी चाहिए, जहां बच्चे और आम लोग बिना डर के आ-जा सकें।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने सुनवाई के दौरान अधिकारियों की नाकामी पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि एनिमल बर्थ कंट्रोल नियमों का सही ढंग से पालन नहीं हो रहा, जिससे काटने की घटनाएं बढ़ रही हैं और लोग जान गंवा रहे हैं।

सुनवाई के मुख्य बिंदु

बेंच ने टिप्पणी की कि रोकथाम इलाज से बेहतर है। सड़कें और सार्वजनिक जगहें साफ-सुथरी तथा सुरक्षित होनी चाहिए। कुत्ते काटें या न काटें, लेकिन वे दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं। हाल के दिनों में राजस्थान में दो जजों की गाड़ियां आवारा पशुओं से टकराईं, जिसमें एक जज अभी भी चोट से उबर रहे हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कुत्तों की पक्षधरता करते हुए कहा कि उन्हें कभी कुत्तों ने नहीं काटा। इस पर कोर्ट ने जवाब दिया कि आप भाग्यशाली हैं, लेकिन बच्चे और बड़े बुरी तरह काटे जा रहे हैं, लोग मर रहे हैं। सिब्बल ने स्टेरलाइजेशन और वैक्सीनेशन के बाद कुत्तों को वापस छोड़ने की वकालत की, क्योंकि हटाने से नई समस्या पैदा होती है।

दूसरी तरफ, सॉलिसिटर जनरल और पीड़ितों के प्रतिनिधियों ने संस्थागत क्षेत्रों से कुत्तों को पूरी तरह हटाने पर जोर दिया। कोर्ट ने गेटेड सोसाइटी में कुत्तों की मौजूदगी पर फैसला निवासियों पर छोड़ने की बात कही।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जुलाई 2025 में स्वत: संज्ञान से शुरू हुआ, जब दिल्ली में कुत्तों के काटने से रेबीज के मामलों पर मीडिया रिपोर्ट्स आईं। नवंबर 2025 में कोर्ट ने स्कूल, अस्पताल, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड जैसे जगहों से कुत्तों को हटाकर शेल्टर में शिफ्ट करने का निर्देश दिया था। कई राज्यों ने अनुपालन रिपोर्ट नहीं दी, जिस पर कोर्ट नाराज है।

अमिकस क्यूरी ने बताया कि हाईवे पर आवारा पशुओं से सुरक्षा के लिए बैरिकेडिंग और शेल्टर की जरूरत है। सुनवाई में दोनों पक्षों – पीड़ितों और पशु प्रेमियों – की दलीलें सुनी गईं। कोर्ट ने व्यंग्य किया कि अब बस कुत्तों को काउंसलिंग देने की बारी रह गई है।