इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने 9 अप्रैल को अपना इस्तीफा सीधे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दिया। यह इस्तीफा उस समय आया है जब संसद में उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने वाली थी। इस्तीफे के साथ ही उनके विरुद्ध चल रही संसदीय कार्यवाही भी अपने आप रुक गई है।
यह घटना भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में तीसरी बार हुई है जब कोई कार्यरत न्यायाधीश महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने से ठीक पहले अपने पद का त्याग कर दिया। इससे पहले वर्ष 2011 में कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन और सिक्किम हाईकोर्ट के जस्टिस पी.डी. दिनाकरन ने भी महाभियोग की कार्रवाई काफी आगे बढ़ जाने के बाद इस्तीफा दे दिया था।
विवाद की शुरुआत मार्च 2025 में हुई थी जब जस्टिस वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट में न्यायाधीश थे। उनके सरकारी बंगले के स्टोररूम में लगी आग बुझाने के दौरान पुलिस और फायर ब्रिगेड को लगभग 15 करोड़ रुपये का जला और अधजला नकदी बरामद हुई थी। जस्टिस वर्मा ने इन आरोपों से साफ इनकार किया और कहा कि घटना के समय वे दिल्ली से बाहर थे।
सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस जांच समिति की रिपोर्ट के बाद उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया और न्यायिक कार्यों से अलग रखा गया। जुलाई 2025 में 100 से अधिक सांसदों ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया, जिसके बाद संसद की तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की गई। समिति की रिपोर्ट आने से पहले ही जस्टिस वर्मा ने 13 पृष्ठों का पत्र लिखकर इस्तीफा सौंप दिया। अपने पत्र में उन्होंने जांच प्रक्रिया पर पूर्वाग्रह का आरोप लगाया।
भारतीय संविधान के अनुसार किसी जज को पद से हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। इस्तीफा देने के बाद महाभियोग की संसदीय प्रक्रिया स्वतः समाप्त हो जाती है। इससे जज को सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन और अन्य सरकारी सुविधाएं बिना किसी रुकावट के जारी रहती हैं, क्योंकि वर्तमान कानून में इस्तीफे के बाद इन लाभों को रोकने का कोई प्रावधान नहीं है।