मध्य प्रदेश की राजधानी स्थित कलेक्टोरेट परिसर मंगलवार को उस समय अखाड़े में तब्दील हो गया, जब एक महिला अपने पूरे परिवार के साथ हाथों में पेट्रोल की बोतल लेकर आत्मदाह करने पहुँच गई। कृष्णाधाम कॉलोनी निवासी गीता अहिरवार ने ‘सितारा फाइनेंस कंपनी’ पर गंभीर आरोप लगाते हुए खुद पर पेट्रोल छिड़कने का प्रयास किया, जिससे मौके पर अफरा-तफरी मच गई। परिसर में तैनात कर्मचारियों ने सूझबूझ दिखाते हुए महिला से पेट्रोल की बोतल छीनी और पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को सूचित किया।
सब्सिडी के नाम पर जालसाजी का आरोप
पीड़ित महिला गीता अहिरवार का आरोप है कि उन्होंने अपना घर बनाने के लिए सितारा फाइनेंस कंपनी से ऋण लिया था। लोन के समय कंपनी के प्रतिनिधियों ने उन्हें ₹2 लाख की सरकारी सब्सिडी दिलाने का भरोसा दिया था। महिला का दावा है कि अब कंपनी अपने वादे से मुकर गई है और सब्सिडी का लाभ दिए बिना पूरे पैसे ब्याज सहित मांग रही है। सबसे गंभीर आरोप यह है कि लोन की राशि चुकाने की इच्छा जताने के बावजूद कंपनी उनकी जमीन के मूल दस्तावेज (रजिस्ट्री) वापस नहीं कर रही है।
महिला ने बैंक के एक कर्मचारी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए बताया कि उससे ₹2 लाख की रिश्वत मांगी गई थी। इसमें से वह ₹1.20 लाख दे भी चुकी थी, लेकिन जब बाकी ₹80 हजार लेकर पहुँची, तो कंपनी ने पुराने भुगतान को मानने से इनकार कर दिया और फिर से पूरे ₹2 लाख की मांग शुरू कर दी।
प्रशासन की कार्रवाई: मैनेजर तलब
मामले की गंभीरता को देखते हुए तहसीलदार प्रीति पंथी ने महिला और उसके परिजनों को समझाइश देकर शांत कराया। एसडीएम क्षितिज शर्मा ने घटना का संज्ञान लेते हुए फाइनेंस कंपनी के मैनेजर को सभी मूल दस्तावेजों के साथ तत्काल तलब किया है। एसडीएम ने स्पष्ट किया कि मामले की जानकारी लीड बैंक अधिकारी को दे दी गई है और दस्तावेजों की जांच के बाद यदि कंपनी दोषी पाई जाती है, तो उसके खिलाफ सख्त वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।
किश्तें नहीं भरने का दावा
दूसरी ओर, फाइनेंस कंपनी के एरिया कलेक्शन मैनेजर कमलेश शर्मा ने महिला के आरोपों को गलत बताया है। कंपनी का कहना है कि महिला ने ₹6 लाख का हाउसिंग लोन लिया था, जिसकी पिछले एक साल से किश्तें जमा नहीं की गई हैं। कंपनी ने यह भी आरोप लगाया कि बैंक का बकाया चुकाए बिना ही परिवार ने मकान का सौदा किसी और से कर दिया है, जिसके कारण नियमानुसार रिकवरी की कार्रवाई की जा रही है।
फिलहाल, कलेक्टोरेट में हुई इस घटना ने निजी फाइनेंस कंपनियों की कार्यप्रणाली और कर्जदारों के मानसिक दबाव को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। प्रशासन अब दोनों पक्षों के दस्तावेजों का मिलान कर रहा है।