भारत में शांति बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन इस रुख़ को कायरता या निष्क्रियता (pacifism) न समझा जाए। यह संदेश देते हुए चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने मध्यप्रदेश के महू में आयोजित एक कार्यक्रम ‘रण संवाद’ में स्पष्ट किया कि ज़रूरत पड़ने पर भारत करारा जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है।
उन्होंने कहा, “भारत हमेशा शांति के पक्ष में खड़ा रहा है। हम एक शांति-प्रेमी राष्ट्र हैं, लेकिन हमें पेसिफ़िस्ट मत समझें। मेरी नज़र में शक्ति के बिना शांति केवल कल्पना है। जैसा कि एक लैटिन कहावत है—‘अगर तुम शांति चाहते हो, तो युद्ध की तैयारी करो।’”
#WATCH | "India has always stood on the side of peace. We are a peace-loving nation, but don't get mistaken, we cannot be pacifists. I think peace without power is utopian. I like to state a Latin quote which translates, 'if you want peace, prepare for war'…" says CDS General… pic.twitter.com/auyHR1fgWw
— ANI (@ANI) August 26, 2025
आत्मनिर्भरता पर ज़ोर
जनरल चौहान ने कहा कि भारत को केवल तकनीक ही नहीं बल्कि विचारों और व्यवहार में भी आत्मनिर्भर होना होगा। उन्होंने कहा कि समाज के सभी वर्गों को सैन्य सिद्धांतों और व्यवहारिक पहलुओं की समझ बढ़ाने की ज़रूरत है।
उन्होंने कहा, “विकसित भारत बनने के लिए हमें शस्त्र-संपन्न , सुरक्षित और आत्मनिर्भर होना होगा।”
ऑपरेशन सिंदूर और पाकिस्तान से सबक
सीडीएस चौहान ने कहा कि “ऑपरेशन सिंदूर अब भी जारी है” और पाकिस्तान के साथ हुए हाल ही के संघर्ष से भारत ने कई अहम सबक सीखे हैं। उनके मुताबिक, युद्ध से मिली इन शिक्षाओं को अब लागू किया जा रहा है। उन्होंने भविष्य के युद्धों की मुख्य दिशा पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि अब राजनीतिक उद्देश्यों को अल्पकालिक लेकिन तीव्र संघर्षों के ज़रिए भी पूरा किया जा सकता है। युद्ध और शांति के बीच की रेखा धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही है और मौजूदा दौर में संघर्ष एक सतत प्रक्रिया बन चुका है, जिसमें प्रतिस्पर्धा, संकट, टकराव, संघर्ष और युद्ध—ये पाँच चरण शामिल हैं।
जनरल चौहान के अनुसार, आधुनिक युद्धों में जनता की भूमिका पहले से कहीं अधिक निर्णायक हो गई है। जहाँ पहले क्षेत्र और विचारधारा के लिए सैनिकों और नागरिकों की कुर्बानी दी जाती थी, वहीं अब लोगों की भागीदारी और समर्थन ही युद्ध की दिशा तय करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विजय की परिभाषा अब बदल रही है। पहले जीत को दुश्मन के हताहतों और बंदी बनाए गए सैनिकों की संख्या से आँका जाता था, जैसे 1971 में 95,000 पाकिस्तानी सैनिक बंदी बनाए गए थे। लेकिन आज के दौर में सफलता का पैमाना ऑपरेशनों की गति, उनके प्रभाव और लंबी दूरी तक की सटीक मारक क्षमता है।
हाल ही मे भारत-पाक संघर्ष
गौरतलब है कि मई में पहलगाम आतंकी हमले (जिसमें 26 नागरिकों की मौत हुई) के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच ज़ोरदार संघर्ष हुआ था। यह लड़ाई उस समय रुकी, जब इस्लामाबाद ने युद्धविराम की अपील की, जिसे नई दिल्ली ने स्वीकार कर लिया।