ईरान इन दिनों गंभीर आर्थिक मंदी और राजनीतिक उथल-पुथल का सामना कर रहा है। देश की मुद्रा ईरानी रियाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गई है। ओपन मार्केट में 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत लगभग 14.57 लाख रियाल तक पहुंच चुकी है, जबकि यूरो के मुकाबले इसकी वैल्यू इतनी कम हो गई है कि कई अंतरराष्ट्रीय एक्सचेंज सिस्टम में इसे व्यावहारिक रूप से शून्य या नगण्य दिखाया जा रहा है। इससे यूरोपीय संघ के 27 देशों में रियाल का उपयोग या एक्सचेंज लगभग असंभव हो गया है।
दिसंबर 2025 के अंत से शुरू हुए विरोध प्रदर्शन अब देशव्यापी आंदोलन में बदल चुके हैं। शुरुआत तेहरान के ग्रैंड बाजार में व्यापारियों की हड़ताल से हुई थी, जो अब महंगाई, बेरोजगारी और शासन के खिलाफ व्यापक असंतोष में तब्दील हो गया है। प्रदर्शनकारी सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के खिलाफ नारे लगा रहे हैं, और आंदोलन अब 31 प्रांतों में फैल चुका है। सुरक्षा बलों की कड़ी कार्रवाई के बावजूद प्रदर्शन थम नहीं रहे हैं, जिसमें अब तक सैकड़ों लोगों की मौत और हजारों की गिरफ्तारी की खबरें हैं।
रियाल की गिरावट के मुख्य कारण
ईरान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों की चपेट में है। जून 2025 में इजरायल के साथ हुए 12 दिनों के संघर्ष ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। नतीजतन, रियाल की वैल्यू में भारी गिरावट आई है।
- महंगाई दर दिसंबर 2025 में 42% से ऊपर पहुंच गई, जबकि खाद्य पदार्थों की कीमतों में 70-72% तक की बढ़ोतरी हुई।
- आम ईरानी नागरिक बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हो गए हैं।
- भारतीय रुपये के मुकाबले 1 रियाल की वैल्यू मात्र 0.00006 रुपये के आसपास है, यानी 1 भारतीय रुपया करीब 16,700 रियाल के बराबर है।
यह गिरावट इतनी तेज है कि पिछले एक साल में रियाल ने अपनी वैल्यू का बड़ा हिस्सा खो दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की नीतियां, जैसे सब्सिडी वाले विदेशी मुद्रा दर में बदलाव, ने स्थिति को और जटिल बनाया है।
सरकार की प्रतिक्रिया और चुनौतियां
ईरान सरकार ने प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए पूरे देश में इंटरनेट ब्लैकआउट लागू किया है। केंद्रीय बैंक के गवर्नर मोहम्मद रेजा फरजिन ने दिसंबर 2025 में इस्तीफा दे दिया था। राष्ट्रपति ने प्रदर्शनकारियों को ‘दंगाई’ करार दिया है, लेकिन आर्थिक राहत के लिए कुछ कदम जैसे मासिक कूपन वितरण की घोषणा की गई है। हालांकि, अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ये उपाय अल्पकालिक हैं और कीमतों को स्थिर नहीं कर पाएंगे।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका ने ईरान से जुड़े व्यापार पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे स्थिति और खराब हो सकती है। प्रदर्शन अब आर्थिक मुद्दों से आगे बढ़कर शासन परिवर्तन की मांग तक पहुंच चुके हैं।